एक ऐसी दरगाह से जहाँ से नहीं लोटकर आता कोई खाली हाथ

मुंबई के वर्ली में समुद्र के अंदर एक छोटे से एक टापू पर यह दरगाह मौजूद है. अरब सागर के बीच 19वीं सदी में बनी मुंबई की यह प्रसिद्ध दरगाह जमीन से 500 गज दूर समुद्र में स्थित है. यह दरगाह मुस्लिम और हिन्दू ही नहीं, बल्कि अन्य धर्मों के लोगों के लिए भी समान रूप से आस्था और विश्वास का केंद्र है. समुद्र की लहरें इस दरगाह की चौखट को चुम लौट जाती है.

पानी की लहरों में बीच सफेद रंग से उज्जवल हाजी अली की दरगाह बेहद दर्शनीय लगती है. बताया जाता है की एक बार अपनी माता की अनुमति लेकर हाजी अली शाह बुखारी अपने भाई के साथ भारत आए और मुंबई के वर्ली इलाके में रहने लगे. कुछ समय बाद जब उनके अपने गृह स्थान लौटने का समय आया तब वापस ना जाकर उन्होंने अपने मां के नाम एक पत्र भेजा जिसमें माफी मांगते हुए उन्होंने लिखा था कि अब वह यहीं रहकर इस्लाम का प्रचार-प्रसार करेंगे, लोगों को इस्लाम की शिक्षा देंगे.

बाबा हाजी की दरगाह पर हिन्दू, मुस्लिम सभी लोग यहां पर बड़ी आशाओं संग आते हैं और जिसने भी दिल से इस दरगाह पर मुराद मांगी वो कभी खाली हाथ नही लौटा है. हर रोज पुरे भारत के कोने-कोने से हजारो लोग प्रत्येक महीने यहां आते है. यहां पर औरतों के लिए अलग से रूम बना हुआ है जहां वो जाकर जियारत करती हैं. अक्सर ईद के दुसरे दिन यहां लोगो की बड़ी भीड़ देखने को मिलती है.

इस पवित्र दरगाह का निर्माण 1931 में हुआ था. इसका निर्माण कराने वाले शख्स का नाम हाजी उस्मान था जिन्होंने दरगाह को तैयार करवाया था. हाजी उस्मान के पास समुद्र में चलनेवाली बोट का बिज़नेस था जिसमे वो उन हजयात्रियों को हज ले जाने वर्क किया करते थे.

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