गुड़ी पाड़वा : हिन्दू नव वर्ष की शुभ शुरूआत, आस्था और परम्पराओं का पावन पर्व

Highlights चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को गुड़ी पाड़वा के रूप में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की थी। गुड़ी पाड़वा के अवसर पर पूरण पोळी और श्रीखंड जैसे व्यंजन बनाए जाते है और भगवान को भोग लगाया जाता है।

हिंदू कैलेंडर के अनुसार, चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से नए साल की शुरुआत होती है, जिसे महाराष्ट्र और भारत के अन्य हिस्सों में “गुड़ी पाड़वा” के रूप में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार हमारे सांस्कृतिक गौरव और पौराणिक मान्यताओं को दर्शाता है। इसी दिन से चैत्र नवरात्रि की भी शुरुआत होती है, जिससे वातावरण में एक विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा फैल जाती है। जिन घरों में घटस्थापना जाती है, वहां पर देवी का पूजन और छोटी कन्याओं को भोजन आदि भी कराया जाता है। इस वर्ष गुड़ी पाड़वा 19 मार्च को मनाया जाएगा। इस दिन से विक्रम संवत 2083 और शालिवाहन शक 1948 की शुरूआत होने जा रही है।

मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की थी। एक अन्य कथा के अनुसार, प्रभु श्रीराम ने इसी दिन किष्किंधा के राजा और सुग्रीव के बड़े भाई “वाली” का वध किया था। यह दिन बुराई पर अच्छाई की जीत और एक नए अध्याय की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। इसी दिन से श्रीराम जन्मोत्सव से जुड़े कार्यक्रमों की भी शुरुआत हो जाती है। गुड़ी पाड़वा​ की सबसे खास पहचान घर की छत या मुख्य द्वार पर सजाई गई “गुड़ी” होती है। इसे बनाने के लिए एक लंबी बांस की लकड़ी पर रेशमी कपड़ा बांधा जाता है। इसके साथ नीम की पत्तियां, फूलों का हार और शक्कर की गांठों की माला लगाई जाती है। लकड़ी के सबसे ऊपर वाले हिस्से पर पीतल का लोटा उल्टा रखकर गुड़ी को सजाया जाता है। घर के बाहर रंगोली भी बनाई जाती है। इसके बाद गुड़ी का पूजन किया जाता है और उसे नैवेद्य अर्पित किया जाता है।

इस दिन खान-पान का भी विशेष महत्व होता है। सुबह उठकर नीम की कोमल पत्तियां खाने की परंपरा है, जो स्वास्थ्य के लिए भी अच्छी मानी जाती है। गुड़ी पाड़वा के अवसर पर पूरण पोळी और श्रीखंड जैसे व्यंजन बनाए जाते हैं और भगवान को भोग लगाया जाता है, जिससे इस पर्व की मिठास और भी बढ़ जाती है। यह त्योहार भारत के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। इसे तेलुगू हिंदुओं द्वारा उगादि, कन्नड़ हिंदुओं द्वारा युगादि और कोंकणी हिंदुओं द्वारा सौसार पाड़वों या सौसार पाड़यो के रूप में भी मनाया जाता है। इसके अलावा कश्मीरी पंडितों द्वारा इसे नवरेह के रूप में मनाया जाता है।

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