पुणे के बहुचर्चित पोर्शे कार हादसे में कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने ब्लड सैंपल बदलने के आरोप में तीन आरोपियों, आशीष मित्तल, आदित्य सूद और अमर संतोष गायकवाड़ को ज़मानत दे दी है। सुप्रीम कोर्ट ने जमानत देते हुए कहा कि तीनों आरोपियों पिछले 18 महीने से हिरासत में है और इस मामले में अधिकतम सज़ा को देखते हुए इन्हें आगे जेल में रखे जाने की आवश्यकता नहीं है। इन पर आरोप था कि हादसे के वक्त कार में मौजूद नाबालिगों को बचाने के लिए इन्होंने ब्लड सैंपल्स से छेड़छाड़ की थी। ये मामला 19 मई 2024 की रात पुणे के कल्याणी नगर इलाके में हुए उस हादसे से जुड़ा है, जिसमें एक लक्ज़री पोर्शे कार ने दो आईटी प्रोफेशनल्स को टक्कर मार दी, जिसकी वजह से उन दोनों की मौत हो गई थी।
जांच में सामने आया कि कार चलाने वाला 17 वर्षीय नाबालिग वेदांत अग्रवाल हादसे के वक्त शराब के नशे में था। आरोप है कि आशीष मित्तल और आदित्य सूद ने कार की पिछली सीट पर बैठे लोगों को बचाने के लिए ब्लड सैंपल्स से छेड़छाड़ की और अपने खून के नमूने दे दिए थे। वहीं अमर संतोष गायकवाड़ पर आरोप है कि उसने बिचौलिए की भूमिका निभाकर इस पूरे हेरफेर के लिए 2 लाख रूपए की घूस ली थी। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुयान की बेंच ने सुनवाई के दौरान माता-पिता की ज़िम्मेदारी पर भी टिप्पणी की।
उन्होंने कहा, "बच्चों पर नियंत्रण न रख पाने के लिए माता-पिता ही दोषी है। नशे में जश्न मनाने के बाद तेज रफ्तार से गाड़ी चलाना और सड़क पर निर्दोष लोगों या सो रहे निर्दोष लोगों की जान लेना। कानून को इन लोगों पर शिकंजा कसना होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि माता-पिता बच्चों को गाड़ी सौंपने और उन्हें मौज-मस्ती के लिए पर्याप्त साधन उपलब्ध कराने के लिए जिम्मेदार हैं। यही समस्या है। क्योंकि माता-पिता के पास बच्चों से बात करने, उनसे संवाद करने और उनके साथ समय बिताने का समय नहीं होता। तो फिर विकल्प क्या है? पैसा, एटीएम कार्ड। इसलिए वे मोबाइल फोन के सहारे अकेले ही निकल जाते हैं।"
इससे पहले, बॉम्बे हाई कोर्ट ने इन तीनों की ज़मानत याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि ये प्रभावशाली लोग हैं और गवाहों को डरा सकते हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अब इन्हें राहत दे दी है। कोर्ट ने साफ किया कि यदि ज़मानत की किसी भी शर्त का उल्लंघन होता है, तो राहत तुरंत वापस ले ली जाएगी। यह मामला पूरे देश में इसलिए चर्चा में रहा था क्योंकि शुरूआत में मुख्य आरोपी नाबालिग को कोर्ट ने सिर्फ 'सड़क सुरक्षा पर निबंध' लिखने की शर्त पर ज़मानत दे दी थी, जिसके बाद भारी जनाक्रोश देखने को मिला था।