प्रधानमंत्री मोदी ने चिन्मय अमृत महोत्सव ग्लोबल सम्मेलन का किया उद्घाटन, स्वामी चिन्मयानंद को किया याद

चिन्मय मिशन एक वैश्विक आध्यात्मिक आंदोलन है, जिसकी स्थापना 1951 में स्वामी चिन्मयानंद ने की थी, ताकि वेदांत और भगवद गीता के ज्ञान को सभी तक पहुँचाया जा सके। पिछले कुछ दशकों में, इस मिशन ने आध्यात्मिक शिक्षा, सांस्कृतिक संरक्षण, युवा सशक्तिकरण और सामुदायिक सेवा के क्षेत्रों में अपने कार्यों का विस्तार किया है।

प्रधानमंत्री मोदी ने चिन्मय अमृत महोत्सव ग्लोबल सम्मेलन का किया उद्घाटन, स्वामी चिन्मयानंद को किया याद

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा की इस कार्यक्रम में शामिल होना उनके लिए अनूठा आध्यात्मिक अनुभव रहा।

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Highlights

  • 23 से 25 अक्टूबर तक चलने वाले इस सम्मेलन में भारत और विदेशों से 9,000 से अधिक प्रतिभागी हिस्सा ले रहे है।
  • प्रधानमंत्री मोदी के अनुसार चिन्मय मिशन एक संस्था नहीं है यह चिन्मय विचार है जिसे एक चिन्मय ऋषि ने स्थापित किया था।
  • प्रधानमंत्री मोदी ने बताया की स्वामी चिन्मयानंद ने अपना पूरा जीवन वयम् राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः इस मंत्र के साथ जीया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार 23 अक्टूबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में चिन्मय अमृत महोत्सव ग्लोबल सम्मेलन का उद्घाटन किया। जानकारी के अनुसार, 23 से 25 अक्टूबर तक चलने वाले इस तीन दिवसीय सम्मेलन में भारत और विदेशों से 9,000 से अधिक प्रतिभागी हिस्सा ले रहे हैं। यह आयोजन चिन्मय मिशन की 75वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में साल भर चले समारोहों का समापन है।

चिन्मय मिशन एक वैश्विक आध्यात्मिक आंदोलन है, जिसकी स्थापना 1951 में स्वामी चिन्मयानंद ने की थी, ताकि वेदांत और भगवद गीता के ज्ञान को सभी तक पहुँचाया जा सके। पिछले कुछ दशकों में, इस मिशन ने आध्यात्मिक शिक्षा, सांस्कृतिक संरक्षण, युवा सशक्तिकरण और सामुदायिक सेवा के क्षेत्रों में अपने कार्यों का विस्तार किया है।

प्रधानमंत्री मोदी ने आज के कार्यक्रम को संबोधित भी किया। उन्होंने कहा कि आज मुझे चिन्मय मिशन के अमृत महोत्सव में शामिल होने का अवसर मिला। यह एक अलग ही आध्यात्मिक अनुभव है। यह संतों का मेरे प्रति विशेष स्नेह और आशीर्वाद को दर्शाता है। चिन्मय मिशन केवल एक संस्था नहीं है। यह चिन्मय विचार है, जिसे एक चिन्मय ऋषि ने स्थापित किया था। इतने दशकों की इसकी यात्रा भी चिन्मय संकल्पों से भरी रही है। इसलिए, भारत मंडपम में आयोजित इस कार्यक्रम का नाम, चिन्मय अमृत महोत्सव भी उतना ही सार्थक है।

प्रधानमंत्री ने आगे बताया कि आज यहाँ आकर मुझे ह्रदय में जो अनुभूति हुई है, उन्हें इस कार्यक्रम में आधुनिक टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से और भी जीवंत रूप मिल गया है। पूज्य गुरुदेव स्वामी चिन्मयानंद को इस रूप में देखना और उनके होलोग्राफिक प्रोजेक्शन के साथ संवाद करने का सौभाग्य मिलना, ऐसा लगा मानो मैं 33 साल पीछे समय में चला गया हूँ। 1993 में वडोदरा में गुरुदेव के साथ मेरी मुलाकात, हमारी बातचीत, उनका स्नेह और उनका आशीर्वाद, ये सब आज मेरी आँखों के सामने फिर से जीवंत हो उठे। 

इस अद्भुत अनुभव को संभव बनाने के लिए मैं चिन्मय मिशन के सभी सदस्यों का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ। उस बातचीत का मुख्य केंद्र युवाओं की शक्ति को निखारना और उस युवा शक्ति के माध्यम से एक सशक्त और समर्थ भारत का निर्माण करना था। उनसे मिलने के कुछ वर्षों बाद जनता, जो ईश्वर का ही रूप है, ने मुझे गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में सेवा करने का आशीर्वाद दिया। 

पिछले पच्चीस वर्षों से, सरकार के मुखिया के रूप में लगातार काम करते हुए, मैंने अपनी पूरी क्षमता से राष्ट्र की सेवा करने के लिए खुद को समर्पित कर दिया है। इस पूरी यात्रा के दौरान, देश के युवा मेरे प्रयासों और नीतियों के केंद्र में रहे हैं। मुझे खुशी है कि चिन्मय अमृत महोत्सव के दौरान युवाओं ने भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली हैं। हमारे कई युवा साथियों ने लगभग 300 दिनों में 40,000 किलोमीटर की यात्रा की है। इस दौरान, वे 1 लाख से अधिक युवाओं तक पहुँचे हैं।

जब हम अपने देश की आजादी की 75वीं वर्षगांठ के करीब पहुंचे, तो मैंने इस अवसर को न केवल विकसित भारत की दिशा में एक कदम के रूप में देखा, बल्कि भारत के उस मूल स्वरूप को फिर से जागृत करने के एक मौके के रूप में भी देखा, जो अमृत आदर्शों को अपनाता है, एक ऐसा भारत, जो सदियों के ज्ञान से प्रेरणा लेते हुए, हमेशा पूरी मानवता के कल्याण के लिए पूरी तरह समर्पित रहा है। इसीलिए मैंने इस उत्सव को अमृत महोत्सव के रूप में मनाने का आह्वान किया। कई आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संगठनों ने अपनी यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ावों पर अमृत संकल्प लिए हैं और अब चिन्मय मिशन भी अमृत महोत्सव के अंतर्गत इस राष्ट्रीय प्रयास, इस अमृत काल में शामिल हो गया है।

प्रधानमंत्री मोदी ने वयम् राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः का उल्लेख किया, जिसका अर्थ है, राष्ट्र का हित चाहने वाले हम लोग राष्ट्र को जागृत और उन्नत बनाए। उन्होंने आगे कहा कि स्वामी चिन्मयानंद ने अपना पूरा जीवन इसी मंत्र को लेकर जिया। जिस निष्ठा के साथ वे आध्यात्मिक विषयों पर बात करते थे, उसी निष्ठा और विस्तार के साथ उन्होंने राष्ट्र से जुड़े विषयों पर भी चर्चा की। क्योंकि हमारा राष्ट्र ही हमारी संस्कृति की जन्मभूमि और हमारे अस्तित्व का आधार है। आज मुझे पूज्य गुरुदेव की जन्म शताब्दी की भी याद आ रही है। वर्ष 2015 में, मुझे उनकी स्मृति में एक विशेष सिक्का जारी करने का सौभाग्य मिला था। उस समय भी मैंने कहा था कि स्वामी चिन्मयानंद का जीवन ज्ञान, कर्म और भक्ति का एक अद्भुत संगम था।

हमने नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति पेश की है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि शिक्षा प्रणाली नए भारत की जरूरतों को पूरा करे। यह नीति भारत की ज्ञान परंपराओं, मातृभाषा में शिक्षा, आधुनिक विज्ञान और नई तकनीकों को महत्व देती है। आज, विवेकानंद रॉक मेमोरियल पूरे भारत और दुनिया भर से आने वाले लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक, भारत के सांस्कृतिक केंद्रों का पुनरुद्धार हो रहा है। 

चाहे वह काशी विश्वनाथ धाम का नया स्वरूप हो, अयोध्या में भगवान श्री राम का भव्य मंदिर हो, या केदारनाथ और बद्रीनाथ जैसे हमारे पवित्र स्थल हों, इन सभी स्थानों का महत्व फिर से बढ़ रहा है। अगर आपने हाल ही में केदारनाथ की यात्रा की होगी, तो आपने वहां आदि शंकराचार्य की एक भव्य और दिव्य प्रतिमा देखी होगी, जिसे उसी स्थान पर स्थापित किया गया है जहाँ उन्होंने अपना नश्वर शरीर त्यागा था। ये सभी स्थल अब अपने पुराने वैभव को पुनः प्राप्त कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि हमें समाज को उन ताकतों के खिलाफ एकजुट करना होगा जो हमें बांटना चाहती हैं, नागरिकों के बीच आत्मनिर्भरता को लेकर जागरूकता बढ़ानी होगी और हर व्यक्ति को 2047 तक एक विकसित भारत बनाने के संकल्प से जोड़ना होगा। इन लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में हमें और अधिक सक्रिय होना होगा।

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