स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को लेकर चल रहे राजनीतिक विवाद के बीच, केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कांग्रेस और उसके सहयोगियों पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ दिनों में दिल्ली में जो घटनाक्रम हुए, वह कई गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
ऐसा लगता है कि कांग्रेस और उसके राजनीतिक सहयोगी, चाहे सीधे तौर पर हों या अपने जुड़े हुए संगठनों के माध्यम से, युवाओं की ऊर्जा को रचनात्मक कार्यों और राष्ट्र-निर्माण में लगाने के बजाय, उसका इस्तेमाल राजनीतिक टकराव और अराजकता फैलाने के लिए कर रहे हैं। उन्होंने देश के युवाओं को अराजकता की राजनीति में मोहरा बनाने की कोशिश की है।
वे बांग्लादेश की तर्ज पर सत्ता परिवर्तन करना चाहते हैं। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में, एक व्यक्ति खुलेआम कहता है कि उन्हें सत्ता परिवर्तन की प्रेरणा बांग्लादेश से मिली है, जबकि दूसरा बेझिझक ऐलान करता है कि सरकार को गिरा देना चाहिए। इससे यह साफ हो जाता है कि उनका एकमात्र एजेंडा लोकतांत्रिक संस्थाओं को नष्ट करना और देश में आग लगाना है।
भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं को राजनीतिक हितों की बलि नहीं बनाया जा सकता। इस बात को समझने की जरूरत है। झूठे आक्रोश, संस्थाओं को बदनाम करने की कोशिशों और राजनीतिक अवसरवाद के जरिए भारत की विकास यात्रा को प्रभावित नहीं किया जा सकता। राहुल गांधी को व्यवधान की राजनीति करने के बजाय, जन-जनादेश का सम्मान करना चाहिए और अपनी राजनीतिक भूमिका पर आत्म-चिंतन करना चाहिए।
राजनाथ सिंह के अनुसार, कांग्रेस के संरक्षण और शासनकाल में तीन बड़े और अक्षम्य अपराध हुए। पहला, 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाया गया आपातकाल। दूसरा, 1984 में सिख भाई-बहनों का नरसंहार, जो कांग्रेस के संरक्षण में हुआ। तीसरा, 1990 में एक ऐसी सरकार को समर्थन देना, जिसके कार्यकाल में राम भक्त कार सेवकों का खून-खराबा हुआ। उन्होंने आगे बताया कि कांग्रेस अभी एक चौथा अपराध भी कर रही है, वह संविधान, संवैधानिक मूल्यों और संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर कर रही है।
उन्होंने कहा कि 1975 में इंदिरा गांधी ने लोकतंत्र को सलाखों के पीछे डाल दिया था। उन्होंने लोकतंत्र को कैद कर दिया था। आज, राहुल गांधी संविधान को अपनी जेब में रखकर अराजकता फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस के इतिहास के पन्नों को पलटकर देखने पर कई काले अध्याय मिलेंगे। राहुल गांधी की कांग्रेस, जो देश के चुनाव आयोग और चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाती है, उसने खुद चुनाव आयोग और चुनाव प्रक्रिया को कठपुतली की तरह अपने नियंत्रण में रखा था।
1993 में, कांग्रेस सरकार ने चुनाव आयोग में अचानक बदलाव किए। रातों-रात दो नए चुनाव आयुक्त नियुक्त कर दिए गए। आपको याद होगा कि पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर चुनाव आयुक्त नवीन चावला को उनके पद से हटाने की सिफारिश की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि नवीन चावला ने चुनाव आयोग की संवेदनशील जानकारी कांग्रेस नेताओं के साथ साझा की थी। ये बहुत गंभीर आरोप हैं।
देश में पांच से दस दशकों तक बिना वोटर आईडी कार्ड के चुनाव होते रहे। दूसरे शब्दों में कहें तो, 1993 से पहले वोटर आईडी कार्ड होते ही नहीं थे। मतदाता की पहचान साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं था। जब से वोटर आईडी कार्ड आए हैं, तब से कांग्रेस के लिए बहुमत पाना एक दूर का सपना बन गया है। जब से देश में वोटर आईडी कार्ड की व्यवस्था लागू हुई है, तब से कांग्रेस ने लोकसभा में अपने दम पर बहुमत हासिल करके केंद्र में सरकार नहीं बनाई है।
कांग्रेस का दावा है कि उसके वोट चोरी हो गए हैं। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस आखिरी बार 1985 में जीती थी। वह 1985 में जीती थी और 1984 के बाद से कांग्रेस को देश में कभी बहुमत नहीं मिला। उस समय, भारतीय जनता पार्टी के पास केवल दो सीटें थीं। क्या यह वोटों की चोरी थी या फिर कांग्रेस का खराब प्रदर्शन? राहुल गांधी को इस सवाल का जवाब देना चाहिए।
जहाँ तक हमारी बात है, हमने कभी भी संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल नहीं उठाए हैं। यह हमारा चरित्र है। हमने कभी देश की चुनाव प्रणाली पर भी संदेह नहीं किया, और न ही हमने कभी संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम करके जनता को गुमराह करने की कोशिश की है। हमने हमेशा इस देश के लोगों, संविधान और संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान किया है।
भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में नई ऊंचाइयां छू रहा है। हमने दो दर्जन से अधिक देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) किए हैं। हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 35 देशों से सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान मिले हैं। अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की प्रतिष्ठा बढ़ रही है, जबकि कांग्रेस पार्टी और उसके कुछ सहयोगी देश को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं।
भारत ने रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। पहले रक्षा उत्पादन मुश्किल से 30,000 करोड़ रुपये का था, लेकिन आज यह 1,80,000 करोड़ रुपये से अधिक हो गया है। भारत अब रक्षा उपकरणों का आयातक नहीं, बल्कि निर्यातक बन गया है। यह समझा जा सकता है कि कई ताकतों को भारत का बढ़ता कद रास नहीं आ रहा होगा।
देश को यह समझने की जरूरत है कि जो राजनीतिक दल दशकों से चुनाव हारते आ रहे हैं, वे आज जानबूझकर या अनजाने में इन्हीं ताकतों के हाथों में खेल रहे हैं। 'सत्ता परिवर्तन', 'प्रतिरोध' और 'आगे का रास्ता संसद में नहीं, बल्कि सड़कों पर है' जैसी बातें यह स्पष्ट करती हैं कि दिल्ली में जो कुछ भी हो रहा है, वह संवैधानिक व्यवस्था के तहत नहीं हो रहा है, बल्कि यह अराजकता के जरिए भारत की प्रगति को पटरी से उतारने की एक निंदनीय कोशिश है।