उत्तर प्रदेश से भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राज्यसभा सांसद डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने आज नई दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जिसमें उन्होंने विपक्ष के नेता राहुल गांधी पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी का मूलमंत्र सत्ता में रहते हुए लूट, समाज में फूट और भारतीय धर्म व संस्कृति के प्रति दिल में घृणा है और इसके ड्राइविंग इंजन ऐसे नेता हैं, जो दुर्भाग्य से देश में विपक्ष के नेता भी है। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है, शायद देश से कहीं ज्यादा कांग्रेस पार्टी के लिए, क्योंकि वह नेता फिलहाल देश से ही गायब है।
सूत्रों के अनुसार, वह वियतनाम में कहीं विचरण कर रहे हैं। वह देश और अपनी खुद की पार्टी, दोनों के लिए एक पहेली बन गया है। जहाँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ट्रैक रिकॉर्ड उपलब्धियों से भरा है, वहीं राहुल गांधी का ट्रैक रिकॉर्ड कांग्रेस पार्टी के लिए समस्याओं से भरा रहा है। आज, कांग्रेस पार्टी ने न केवल अपने भविष्य को खतरे में डाला है, बल्कि देश के संवैधानिक व्यवस्था को भी दांव पर लगा दिया है।
त्रिवेदी ने कहा कि राहुल गांधी को लॉन्च करने के लिए की गई तमाम कोशिशों ने कांग्रेस को अब एक बेहद खतरनाक स्थिति में ला खड़ा किया है। एक ऐसी स्थिति, जहाँ वह खुद को राष्ट्र-विरोधी ताकतों के साथ खड़ा पाती है। जब भी राहुल गांधी विदेश जाते हैं, तो वे ऐसी अज्ञात यात्राओं पर निकल पड़ते हैं, जिनके दौरान वे संदिग्ध लोगों से मिलते हैं। वे ऐसी जगहों पर जाते हैं जिनका खुलासा नहीं किया जाता और वहाँ संदिग्ध लोगों से मुलाकात करते हैं।
संसद की वह घटना याद कीजिए, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गले लगाने के बाद,राहुल गांधी अपनी सीट पर लौटे और अखियों से गोली मारे वाला निशान किया था। क्या आपको लगता है कि यह किसी व्यक्ति से अपेक्षित परिपक्वता, गंभीरता और स्थिरता को दर्शाता है? मैं इसके लिए एक प्रमाण दे रहा हूँ। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपनी किताब 'अ प्रॉमिस्ड लैंड' में 2010 की अपनी भारत यात्रा के दौरान राहुल गांधी से हुई मुलाकात का जिक्र किया है।
चैप्टर 24 में, उन्होंने राहुल गांधी के बारे में लिखा है कि उनमें एक तरह की 'घबराहट और अपरिपक्वता' थी। वे किसी ऐसे छात्र की तरह लग रहे थे जिसने अपना कोर्सवर्क तो पूरा कर लिया हो और वह शिक्षकों को प्रभावित करने के लिए उत्सुक हो, लेकिन गहराई में देखें तो उसमें उस विषय में महारत हासिल करने के लिए न तो जरूरी योग्यता थी और न ही कोई जुनून।
त्रिवेदी ने आगे बताया कि जवाहरलाल नेहरू सरदार वल्लभभाई पटेल का हक मारकर शून्य वोट के साथ प्रधानमंत्री बने। उनके कार्यकाल के दौरान देश ने बंटवारा देखा, जो मानव इतिहास के सबसे खूनी अध्यायों में से एक है। नेहरू 15 अगस्त 1947 को नहीं, बल्कि 2 सितंबर 1946 को अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री बने थे और बंटवारा उनके कार्यकाल के दौरान ही हुआ।
इंदिरा गांधी ने अपनी पार्टी को तोड़कर अपनी सत्ता मजबूत की। उन्होंने अपने सांसदों से कहा कि वे राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस पार्टी के आधिकारिक रुख के खिलाफ वोट दें (जिसमें नीलम संजीव रेड्डी उम्मीदवार थे), जिसके कारण पार्टी का विभाजन हो गया। इंदिरा गांधी की दुखद हत्या के बाद, 1984 में दिल्ली में सिखों के नरसंहार के बीच राजीव गांधी सत्ता में आए।
सिखों के खिलाफ हिंसा 1 नवंबर 1984 को शुरू हुई थी। कांग्रेस अब उसी तारीख को दिल्ली में विरोध प्रदर्शन करने की योजना बना रही है और मुझे लगता है कि वे शहर को उस अराजकता की याद दिलाना चाहते हैं जो उसने 1984 में देखी थी। राहुल गांधी द्वारा कांग्रेस को पुनर्जीवित करने में बार-बार मिली असफलताओं के कारण, 140 साल पुरानी यह पार्टी अपने सबसे निचले स्तर पर आ गई है। मैंने उन्हें राजनीतिक रूप से स्थापित करने की असफल कोशिशों के कम से कम एक दर्जन उदाहरण दिए हैं। अब कांग्रेस पूरे भारतीय तंत्र को कमजोर करके राहुल गांधी को स्थापित करने की कोशिश कर रही है।