भारत का इतिहास साम्राज्यों के उत्थान और पतन से भरा पड़ा है। मौर्य, गुप्त, चोल और दिल्ली सल्तनत के पश्चात मुगलों ने लगभग 300 साल तक भारतीय उपमहाद्वीप पर राज किया। लेकिन वर्ष 1857 की क्रांति ने वह निर्णायक मोड़ दिया जिसने न केवल ब्रिटिश सत्ता को और भी ज्यादा मजबूत किया, बल्कि सदियों तक भारतीय पहचान का भाग रहे मुगल साम्राज्य का भी अंत कर दिया। वहीं इस क्रांति के पश्चात अंतिम सम्राट बहादुर शाह ज़फर को निर्वासन झेलना पड़ा और उनके उत्तराधिकारी शहजादों की जिंदगी गुमनामी, गरीबी और अपमान के साथ बीती।
1857 की क्रांति और बहादुर शाह ज़फर :
इतना ही नहीं वर्ष 1857 की बगावत का प्रारंभ मेरठ से हुआ, जब भारतीय सिपाहियों ने अंग्रेजी सेना के विरुद्ध विद्रोह किया। धीरे-धीरे यह विद्रोह पूरे उत्तर भारत में फैला। विद्रोहियों को एक प्रतीकात्मक नेतृत्व की जरुरत थी और दिल्ली के लाल किले में बैठे वृद्ध बहादुर शाह ज़फर उस वक़्त स्वाभाविक रूप से उनके नेता बना दिए गए।
हालांकि बहादुर शाह ज़फर स्वयं सैनिक दृष्टि से सक्षम नहीं थे, लेकिन उनकी मौजूदगी विद्रोह को वैधता भी प्रदान की थी। लाल किला एक बार फिर संघर्ष का केंद्र बन गया। लेकिन अंग्रेजों की सैन्य शक्ति और योजनाबद्ध रणनीति ने क्रांति को पूरी तरह से दबा दिया गया।
इतना ही नहीं सितंबर माह वर्ष 1857 में अंग्रेजों ने दिल्ली पर कब्ज़ा कर लिया। बहादुर शाह ज़फर को गिरफ्तार कर 1858 में रंगून (अब यांगून, म्यांमार) निर्वासित किया गया। वहीं 7 नवंबर 1862 को उनकी मृत्यु हो गई। उनकी कब्र लंबे वक़्त तक अज्ञात रही, और यह तथ्य ही दर्शाता है कि अंग्रेज मुगल वंश के अंतिम निशान तक को मिटा देना चाहते थे।
शहजादों का रक्तरंजित अंत :
मिर्ज़ा जवान बख्त: शाही वंशज से भिखारी तक :
बहादुर शाह ज़फर के बेटे मिर्ज़ा जवान बख्त का जन्म लाल किले की शाही दीवारों के भीतर हुआ। लेकिन साम्राज्य टूटने और परिवार के बिखरने के बाद उनकी हालत इतनी खराब हो गई कि वे रात के अंधेरे में दिल्ली की गलियों में भीख मांगते थे। वे अपनी पहचान छुपाने के लिए दिन में कभी बाहर नहीं निकलते थे। यह दृश्य इस बात का प्रतीक है कि कैसे शाही वंशज, जिनके पूर्वज ताज और सिंहासन पर काबिज थे, गुमनामी और अपमान में जीने को मजबूर हो गए।
कमर सुल्तान बहादुर की त्रासदी :
ख्वाजा हसन निज़ामी की किताब ‘बेगमात के आंसू’ में बहादुर शाह ज़फर के पोते कमर सुल्तान बहादुर का उल्लेख है। वे भी भीख मांगते हुए अक्सर कहते –“या अल्लाह, इतना दे कि मैं अपने खाने का सामान खरीद सकूं।” यह वाक्य न केवल एक शहजादे की विवशता का प्रतीक है बल्कि पूरे मुगल वंश की दुर्दशा को दर्शाता है।
अंग्रेजों की नीतियाँ और मुगलों का विस्थापन :
कई राजकुमार कलकत्ता, हैदराबाद, लखनऊ और पाकिस्तान के विभिन्न हिस्सों में जाकर बसे, लेकिन अधिकांश गरीबी और गुमनामी में डूब गए।
यह नीति सिर्फ राजनीतिक नहीं थी, बल्कि यह अंग्रेजों का ‘सांस्कृतिक प्रतिशोध’ भी था। वे चाहते थे कि भारतीयों के दिमाग से हमेशा के लिए मुगलों की ‘शाही छवि’ मिटा दी जाए।
मुगल शहजादों की ऐतिहासिक भूमिका :
मौजूदा समय में मुगल वंशज :
इतिहासकार एस. इरफान हबीब के अनुसार, आज के ये वंशज "मुगल" नाम का इस्तेमाल तो करते हैं, लेकिन उनके पास न तो राजसी ठाठ है और न ही कोई विशेषाधिकार।
बहादुर शाह ज़फर की विरासत :
बहादुर शाह ज़फर केवल एक सम्राट नहीं, बल्कि एक कवि भी थे। निर्वासन के दौरान लिखी उनकी शायरी आज भी लोकप्रिय है। उनका यह शेर –“कितना है बदनसीब ज़फर दफ्न के लिए दो गज ज़मीं भी न मिली कू-ए-यार में”उनकी व्यक्तिगत त्रासदी और मुगल साम्राज्य के अंत की मार्मिक गवाही देता है।
1857 की क्रांति भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का पहला बड़ा प्रयास था, लेकिन इसका परिणाम मुगलों के लिए विनाशकारी रहा। बहादुर शाह ज़फर और उनके शहजादों की कहानियां इस बात की गवाही देती हैं कि कैसे सत्ता के शिखर से गिरकर एक शाही खानदान गुमनामी और दरिद्रता में डूब गया। आज मुगल वंशजों की स्थिति इतिहास की एक बड़ी विडंबना है – वे लोग जिनके पूर्वज ताजमहल और लाल किले जैसी विरासत छोड़ गए, आज उसी इतिहास की किताबों में गुमनाम होकर रह गए हैं।