
7 अगस्त, 2025 को भारत और विश्व भर में महान कवि, लेखक, नाटककार, संगीतकार, दार्शनिक, चित्रकार और समाज सुधारक रवींद्रनाथ टैगोर की 84वीं पुण्यतिथि मनाई जा रही है। रवींद्रनाथ टैगोर, जिन्हें ‘गुरुदेव’, ‘कवि गुरु’ और ‘विश्वकवि’ के नाम से जाना जाता है, एक ऐसी शख्सियत थे जिन्होंने न केवल बंगाली साहित्य और संगीत को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया, बल्कि भारतीय संस्कृति और स्वतंत्रता संग्राम में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी कृति ‘गीतांजलि’ ने उन्हें 1913 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जिससे वे इस सम्मान को प्राप्त करने वाले पहले गैर-यूरोपीय और एशियाई बने। आज उनकी पुण्यतिथि पर, हम उनके जीवन, रचनाओं, और भारतीय समाज पर उनके प्रभाव को याद करते हैं।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा :
रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई, 1861 को कोलकाता के जोरासांको ठाकुरबाड़ी में हुआ था। वे देबेंद्रनाथ टैगोर और शारदा देवी के सबसे छोटे पुत्र थे और 13 जीवित बच्चों में सबसे छोटे थे। टैगोर परिवार बंगाल पुनर्जागरण का अग्रदूत था, जो साहित्यिक पत्रिकाओं, बंगाली और पश्चिमी शास्त्रीय संगीत, नाटक और स्क्रीनप्ले के लिए प्रसिद्ध था। रवींद्रनाथ ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा कोलकाता के प्रतिष्ठित सेंट जेवियर्स स्कूल में प्राप्त की। बाद में, बैरिस्टर बनने की इच्छा से वे इंग्लैंड के ब्रिजटन में एक पब्लिक स्कूल में गए और फिर यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में कानून की पढ़ाई शुरू की, लेकिन 1880 में बिना डिग्री के स्वदेश लौट आए।
बचपन से ही रवींद्रनाथ की रुचि लेखन में थी। मात्र आठ साल की आयु में उन्होंने कविताएँ लिखना शुरू कर दिया था। 16 साल की आयु में, उन्होंने ‘भानुसिंह’ के छद्मनाम से अपनी पहली किताब प्रकाशित की। 20 वर्ष की आयु में, उन्होंने अपना पहला नाटक ‘वाल्मीकि प्रतिभा’ लिखा, जिसे उनके घर जोरासांको ठाकुरबाड़ी में मंचित किया गया, जिसमें उन्होंने स्वयं वाल्मीकि की भूमिका निभाई।
गीतांजलि और अन्य रचनाएँ:
रवींद्रनाथ टैगोर की साहित्यिक यात्रा अत्यंत व्यापक और प्रभावशाली रही। उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति ‘गीतांजलि’ (1910) ने बंगाली साहित्य में एक नया प्रतिमान स्थापित किया। इस काव्य संग्रह में 103 गद्य कविताएँ थीं, जिनका अंग्रेजी अनुवाद टैगोर ने स्वयं किया, और इसकी प्रस्तावना प्रसिद्ध अंग्रेजी कवि डब्ल्यू.बी. येट्स ने लिखी। ‘गीतांजलि’ की कविताएँ प्रेम, आध्यात्मिकता और मानवता की खोज को दर्शाती हैं, जो मध्यकालीन भक्ति गीतों से प्रेरित हैं। इस कृति ने उन्हें 1913 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिलाया।
रवींद्रनाथ टैगोर ने 2,000 से अधिक गीत लिखे, जिन्हें ‘रवींद्र संगीत’ के नाम से जाना जाता है। उनकी अन्य प्रमुख रचनाओं में उपन्यास जैसे ‘गोरा’, ‘घरे-बाहरे’, और नाटक जैसे ‘डाकघर’ और ‘चित्रांगदा’ शामिल हैं। ‘गोरा’ में उन्होंने 1880 के दशक के बंगाल में सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक मान्यताओं को चुनौती दी, जबकि ‘घरे-बाहरे’ में भारत के औपनिवेशिक इतिहास और राष्ट्रीयता के मुद्दों को उजागर किया। उनकी लघु कहानियाँ जैसे ‘काबुलीवाला’, ‘क्षुधित पाषाण’ और ‘अतिथि’ भी उनकी साहित्यिक प्रतिभा का परिचय देती हैं।
रवींद्रनाथ टैगोर ने कबीर के 100 कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद किया, जिसे ‘सॉन्ग्स ऑफ कबीर’ (1915) के रूप में प्रकाशित किया गया। इस पुस्तक में सूफीवाद और हिंदू आध्यात्मिकता का समन्वय देखने को मिलता है, जो टैगोर की सार्वभौमिक दृष्टि को दर्शाता है। उनकी रचनाएँ अंग्रेजी, डच, जर्मन, स्पेनिश और अन्य यूरोपीय भाषाओं में अनुवादित हुईं, जिससे उनकी वैश्विक पहुंच बनी।
राष्ट्रीय गान और स्वतंत्रता संग्राम में योगदानरवींद्रनाथ टैगोर ने दो देशों—भारत और बांग्लादेश—के राष्ट्रीय गान लिखे। भारत का राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’ 1911 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में पहली बार गाया गया और 1950 में इसे भारत का राष्ट्रीय गान चुना गया। बांग्लादेश का राष्ट्रीय गान ‘आमार सोनार बांग्ला’ भी उनकी रचना है। इसके अलावा, श्रीलंका के राष्ट्रीय गान ‘श्रीलंका माता’ को टैगोर की एक कविता से प्रेरित माना जाता है, जिसे सिंहली में अनुवादित किया गया।
टैगोर ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ अपनी लेखनी और विचारों से महत्वपूर्ण योगदान दिया। 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में उन्होंने ‘भारत भाग्य विधाता’ नामक ब्रह्मो भजन की रचना की, जिसका पहला छंद ‘जन गण मन’ बना। 1919 में जलियांवाला बाग नरसंहार के विरोध में उन्होंने अपनी नाइटहुड की उपाधि लौटा दी। कुछ लेखकों के अनुसार, टैगोर ने 6 मार्च, 1915 को महात्मा गांधी को ‘महात्मा’ की उपाधि दी, जिसका अर्थ है ‘महान आत्मा’।
शांति निकेतन और शिक्षा में योगदानटैगोर को पश्चिमी शिक्षा पद्धति पसंद नहीं थी। उन्होंने अपनी नोबेल पुरस्कार की राशि से पश्चिम बंगाल के शांति निकेतन में ‘विश्व-भारती’ विश्वविद्यालय की स्थापना की। यह एक प्रयोगात्मक स्कूल था, जहाँ छात्रों को खुली हवा में पढ़ाया जाता था, और साहित्य के साथ-साथ गायन, नृत्य और चित्रकला जैसे रचनात्मक क्षेत्रों को बढ़ावा दिया जाता था। इस विश्वविद्यालय ने अमर्त्य सेन, सत्यजीत राय और इंदिरा गांधी जैसे उल्लेखनीय व्यक्तियों को शिक्षा दी। टैगोर का मानना था कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो कल्पना और सहजता को प्रोत्साहित करे।
जीवन के अंतिम वर्ष और निधनटैगोर के जीवन के अंतिम वर्ष दर्द और बीमारी से भरे थे। 1937 से उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा था, और 1940 में उनकी हालत गंभीर हो गई। उन्हें यूरिमिया और प्रोस्टेट कैंसर का निदान हुआ। 15 सितंबर, 1940 को उन्हें पेट में तेज दर्द की शिकायत हुई, और जांच में उनके मूत्राशय में संक्रमण पाया गया। टैगोर आयुर्वेदिक उपचार चाहते थे, लेकिन डॉ. ज्योति प्रकाश सरकार और डॉ. बिधान चंद्र राय ने सर्जरी की सलाह दी। 30 जुलाई, 1941 को उनकी इच्छा के खिलाफ सर्जरी की गई, जिसके बाद जटिलताओं के कारण 7 अगस्त, 1941 को कोलकाता के जोरासांको हवेली में उनका निधन हो गया।
उनके अंतिम क्षणों में भी उनकी रचनात्मकता जीवित थी। रानी चंद की पुस्तक ‘गुरुदेव’ के अनुसार, निधन से कुछ समय पहले उन्होंने अपनी अंतिम कविता मौखिक रूप से रची, जिसमें मृत्यु के प्रति उनकी निडरता और जीवन के प्रति प्रेम झलकता है।