जानिए क्या है सिंगल वर्किंग वुमन्स डे का इतिहास, आज हर किसी के लिए मिसाल बन रही महिला

सिंगल वर्किंग वुमन्स डे न केवल उत्सव का मौका है, बल्कि भारत जैसे देश में सिंगल महिलाओं के साहस, मेहनत, और आत्मनिर्भरता को सेलिब्रेट करते हुए लैंगिक समानता की दिशा में एक कदम है।

जानिए क्या है सिंगल वर्किंग वुमन्स डे का इतिहास, आज हर किसी के लिए मिसाल बन रही महिला

लोगों के लिए आज मिसाल बन रही है दुनियाभर की हर नारी

Share:

Highlights

  • 2006 में अमेरिका में बारबरा पेन ने की थी सिंगल वर्किंग वुमन्स डे की शुरुआत।
  • भारत में 52% से अधिक अविवाहित महिलाएं, आर्थिक और सामाजिक योगदान दे रही हैं।
  • महिलाओं के स्वास्थ्य और कल्याण में निवेश से सामाजिक और आर्थिक विकास को बढ़ावा।

प्रतिवर्ष 4 अगस्त को सिंगल वर्किंग वुमन्स डे मनाया जाता है, दरअसल ये उन महिलाओं के लिए होता है जो न केवल अपने करियर में उत्कृष्टता अपने नाम कर रही है, बल्कि स्वतंत्र रूप से अपने जीवन को संभालती हुई दिखाई दे रही है। यह दिन उन अविवाहित कामकाजी महिलाओं के योगदान को और भी अच्छी तरह से उजागर किया है, जो समाज एवं अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही है। भारत जैसे देश में, जहां सामाजिक रूढ़ियां और लैंगिक भेदभाव अब भी चुनौतियां पेश करते हैं, यह दिन इन महिलाओं की मेहनत, साहस और स्वतंत्रता को सेलिब्रेट करने का अवसर देता है।

सिंगल वर्किंग वुमन्स डे का इतिहास और महत्व :

सिंगल वर्किंग वुमन्स डे की शुरुआत 2006 में अमेरिका में बारबरा पेन के द्वारा की गई थी, जो खुद एक सिंगल कामकाजी महिला भी थी। उन्होंने देखा कि माता-पिता और विवाहित जोड़ों के लिए कई अवकाश और उत्सव हैं, लेकिन सिंगल कामकाजी महिलाओं के योगदान को मान्यता देने वाला कोई भी खास दिन नहीं था। इस कमी को दूर करने के लिए उन्होंने सिंगल वर्किंग वुमन्स डे की शुरुआत की, जो अब वैश्विक स्तर पर, खासकर अमेरिका और इंडिया जैसे देशों में, लोकप्रिय हो रहा है। यह दिन न केवल इन महिलाओं की उपलब्धियों को सम्मानित कर रहा है, बल्कि उनके सामने आने वाली चुनौतियों, जैसे लैंगिक वेतन अंतर, कार्यस्थल पर भेदभाव और सामाजिक रूढ़ियों, को भी उजागर करता है।

भारत में, जहां सिंगल महिलाओं को हमेशा सामाजिक दबावों का सामना करना पड़ता है, यह दिन एक प्रेरणा का प्रतीक है। यह समाज को याद दिलाता है कि सिंगल होना कोई कमी नहीं, बल्कि स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता का प्रतीक कहा जा रहा है। भारत में 52% से अधिक महिलाएं अविवाहित हैं, और इनमें से कई अपने दम पर आर्थिक और सामाजिक योगदान दे रही हैं। सिंगल वर्किंग वुमन्स डे इन महिलाओं की मेहनत को सेलिब्रेट करने के साथ-साथ उनके सामने आने वाली चुनौतियों, जैसे किराए पर मकान लेने में कठिनाई, कार्यस्थल पर असमान वेतन, और सामाजिक 'सिंगलिज्म' (एकल लोगों के प्रति भेदभाव) को दूर करने की दिशा में जागरूकता को और भी ज्यादा बढ़ाने का काम करता है।
 

भारत में एकल कामकाजी महिलाओं की भूमिका :

भारत में एकल कामकाजी महिलाएं विभिन्न क्षेत्रों में अग्रणी भूमिका आज भी अदा कर रही है—चाहे वह कॉरपोरेट जगत हो, उद्यमिता, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, या टेक्नोलॉजी। उदाहरण के लिए, रेबेका लुंडबर्ग, एक 31 साल के मार्केटिंग पेशेवर, जो वाशिंगटन डीसी में स्वतंत्र रूप से रहती हैं, कहती हैं, "हमारी पीढ़ी के लिए शादी अब प्राथमिकता नहीं है। हम अपनी आर्थिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को और भी ज्यादा महत्व प्रदान करती है।" इंडिया में भी ऐसी कई महिलाएं हैं, जो अपने करियर और व्यक्तिगत जीवन को अपने तरीके से संतुलित कर रही हैं।

हालांकि, चुनौतियां भी कम नहीं रहीं। भारत में एकल महिलाओं को अक्सर सामाजिक दबावों को भी झेलना पड़ रहा है, जैसे कि शादी के लिए दबाव या किराए पर मकान लेने में भेदभाव। एक हालिया अध्ययन के मुताबिक, इंडिया में महिलाएं पुरुषों की तुलना में 92% कम वेतन कमाती हैं, और सिंगल माताओं को आर्थिक और भावनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ जाता है। इसके बावजूद, ये महिलाएं न केवल अपने परिवारों का समर्थन कर रही हैं, बल्कि समाज में बदलाव लाने में भी योगदान दे रही हैं।

महिलाएं खुद इस दिन को अपने लिए खास बना सकती हैं। एक स्पा डे, दोस्तों के साथ डिनर, या एक छोटा सा वीकेंड गेटवे इस दिन को यादगार बना सकता है। इसके अलावा, सिंगल कामकाजी महिलाओं के लिए आयोजित कार्यशालाओं, सेमिनारों, या नेटवर्किंग इवेंट्स में भाग लेना भी एक शानदार तरीका है, जो न केवल प्रेरणा देता है, बल्कि करियर में आगे बढ़ने के अवसर भी प्रदान करता है।

सामाजिक बदलाव की दिशा में एक कदम :

यह दिन न केवल उत्सव का मौका है, बल्कि लैंगिक समानता और कार्यस्थल पर समान अवसरों की मांग को भी मजबूत करता है। भारत जैसे देश में, जहां सिंगल महिलाओं को अक्सर रूढ़ियों का सामना करना पड़ता है, यह दिन समाज को यह याद दिलाता है कि सिंगल कामकाजी महिलाएं न केवल आत्मनिर्भर हैं, बल्कि अर्थव्यवस्था और समाज की रीढ़ हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, दक्षिण-पूर्व एशिया में महिलाओं के स्वास्थ्य और कल्याण में निवेश से सामाजिक और आर्थिक विकास को और भी ज्यादा बढ़ावा मिल सकता है।

रिलेटेड टॉपिक्स