
नई दिल्ली : भारतीय फुटबॉल के दिग्गज और 'कैप्टन फैंटास्टिक' के नाम से मशहूर सुनील छेत्री 3 अगस्त को अपना 41वां जन्मदिन सेलिब्रेट कर रहे है। इंडियन फुटबॉल को नई ऊंचाइयों तक ले जाने वाले इस खिलाड़ी की जिंदगी प्रेरणा से भरी हुई है। उनकी शिक्षा, करियर के उतार-चढ़ाव, फुटबॉल के प्रति जुनून एवं उनके द्वारा खेले गए मैचों का आंकड़ा उनकी मेहनत और समर्पण की कहानी बताती है। तो चलिए जानते है उनके जीवन से जुड़ी हुई खास बातें...
शुरूआती जीवन और शिक्षा :
सुनील छेत्री का जन्म 3 अगस्त 1984 को तेलंगाना के सिकंदराबाद में ही हुआ था। उनके पिता K.B. छेत्री भारतीय सेना में इलेक्ट्रॉनिक्स और मैकेनिकल इंजीनियर्स कोर में अधिकारी थे और सेना की फुटबॉल टीम के लिए खेलते है। उनकी मां सुषिला छेत्री एवं उनकी जुड़वां बहन ने नेपाल की राष्ट्रीय महिला फुटबॉल टीम का प्रतिनिधित्व किया। फुटबॉल उनके खून में था। पिता की नौकरी की वजह से परिवार को देश भर में स्थानांतरित होना पड़ता था, जिसके चलते सुनील ने गंगटोक के बहाई स्कूल, दिल्ली के आर्मी पब्लिक स्कूल और कोलकाता के आशुतोष कॉलेज से अपनी पढ़ाई पूरी की है। वित्तीय तंगी की वजह से उन्होंने पढ़ाई छोड़कर फुटबॉल को करियर के रूप में चुन लिया।
फुटबॉल के प्रति जुनून :
सुनील छेत्री का फुटबॉल के प्रति लगाव बचपन से ही था। उनके माता-पिता दोनों फुटबॉलर थे, जिसने उन्हें इस खेल की तरफ से अप्रोच भी किया गया। महज 17 साल की आयु में वे दिल्ली के सिटी क्लब के लिए खेलते हुए डूरंड कप में दिखाई दिए, जहां उनकी प्रतिभा को देखकर मोहन बागान ने उन्हें 2002 में ही साइन कर लिया था। यह उनके पेशेवर करियर की शुरुआत कर दी थी। सुनील ने एक इंटरव्यू में कहा था, "जब मोहन बागान का कॉल आया, मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि वे मुझे चाहते हैं।" उनका जुनून और अनुशासन उन्हें सुबह जल्दी उठकर पुश-अप्स करने और लगातार प्रशिक्षण लेने के लिए प्रेरित करता रहा।
खबरों की माने तो सुनील ने 2002 में मोहन बागान के साथ अपने पेशेवर करियर को शुरू किया, जहां उन्होंने 24 मैचों में 14 गोल किए। 2005 में JCT FC में शामिल होने के पश्चात उन्होंने 48 मैचों में 21 गोल भी दागे। वर्ष 2007 में उन्हें अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (AIFF) का प्लेयर ऑफ द ईयर चुन लिया गया। उनकी प्रतिभा ने उन्हें विदेशी क्लबों का ध्यान अपनी तरफ खींचा। 2010 में वे कंसास सिटी विजार्ड्स के साथ मेजर लीग सॉकर (MLS) में खेलने वाले तीसरे भारतीय बने, हालांकि वहां वे ज्यादा समय नहीं टिक पाए। 2012 में पुर्तगाल के स्पोर्टिंग लिस्बन के रिजर्व टीम के लिए खेला, लेकिन वहां भी उन्हें सीमित अवसर ही मिले।
वर्ष 2013 में बेंगलुरु एफसी में शामिल होने के पश्चात सुनील का करियर नई ऊंचाइयों पर पहुंचा। उन्होंने I-लीग (2014, 2016), इंडियन सुपर लीग (2019), एवं सुपर कप (2018) जैसे खिताब अपने नाम किए। वे ISL के सर्वकालिक शीर्ष गोल स्कोरर हैं, जिन्होंने 2024-25 सीजन में 28 मैचों में 14 गोल किए। इंटरनेशनल लेवल पर, सुनील ने 2005 में पाकिस्तान के विरुद्ध डेब्यू किया एवं 154 मैचों में 95 गोल के साथ भारत के सर्वकालिक शीर्ष स्कोरर हैं। वे विश्व के सक्रिय खिलाड़ियों में तीसरे सबसे ज्यादा इंटरनेशनल गोल करने वाले खिलाड़ी हैं, केवल क्रिस्टियानो रोनाल्डो और लियोनेल मेसी से पीछे।
करियर के उतार-चढ़ाव :
सुनील का करियर हमेशा आसान नहीं था। एक वक़्त उनके कोच ने बोला था कि वे टीम में रहने लायक नहीं हैं। विदेशी लीग में उनकी स्टेटर्जी उम्मीद के मुताबिक सफल नहीं रही। 2008 में ईस्ट बंगाल के लिए खेलते हुए उन्होंने मोहन बागान के विरुद्ध सेमीफाइनल में निर्णायक पेनल्टी मिस की, जिससे टीम टूर्नामेंट से बाहर हुई। वर्ष 2024 में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल से संन्यास का एलान कर दिया, लेकिन नए कोच मनोलो मार्क्वेज़ के अनुरोध पर मार्च 2025 में वापसी की और मालदीव के विरुद्ध भी किया। उनकी मेहनत और दृढ़ता ने उन्हें हर बार वापसी करने की ताकत दी।
मैचों की संख्या और रिकॉर्ड :
सुनील ने क्लब और देश के लिए कुल 553 मैच खेले, जिनमें 270 गोल कर चुके है। भारत के लिए 154 अंतरराष्ट्रीय मैचों में 95 गोल के साथ वे सबसे अधिक कैप्ड खिलाड़ी हैं। उन्होंने नेहरू कप (2007, 2009, 2012), SAFF चैंपियनशिप (2011, 2015, 2021, 2023), और AFC चैलेंज कप (2008) जैसे टूर्नामेंट जीते। 2011 SAFF चैंपियनशिप में 7 गोल के साथ वे टूर्नामेंट के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुने गए।
निजी जीवन और विरासत :
सुनील ने 2017 में सोनम भट्टाचार्य से शादी की, जिनके पिता पूर्व भारतीय खिलाड़ी सुब्रत भट्टाचार्य हैं। 2023 में उनके बेटे ध्रुव का जन्म हुआ। FIFA ने 2022 में उनकी जिंदगी पर 'कैप्टन फैंटास्टिक' नामक डॉक्यूमेंट्री रिलीज की। सात बार AIFF प्लेयर ऑफ द ईयर, अर्जुन अवॉर्ड (2011), और खेल रत्न (2021) जैसे सम्मानों से नवाजे गए सुनील भारतीय फुटबॉल के प्रतीक हैं। सुनील छेत्री की कहानी मेहनत, जुनून और समर्पण की मिसाल है। उनका जन्मदिन न केवल उनके लिए, बल्कि भारतीय फुटबॉल के लिए भी उत्सव का दिन है।