आखिर क्या है GLOF और LLOF, जिसने उजाड़ दिया कई लोगों का घर संसार

हिमालय में GLOF और LLOF आपदाएँ गंभीर खतरा हैं। GLOF ग्लेशियल झीलों के टूटने, LLOF भूस्खलन से बनी झीलों के टूटने से होती है। केदारनाथ (2013), चमोली (2021) जैसी घटनाएँ चेतावनी हैं। निगरानी और संरक्षण जरूरी।

आखिर क्या है GLOF और LLOF, जिसने उजाड़ दिया कई लोगों का घर संसार

GLOF और LLOF की वजह से मची तबाही

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Highlights

  • ग्लेशियर झील का बांध टूटने से बाढ़, बढ़ी लोगों की परेशानी।
  • GLOF और LLOF जैसी आपदाएँ जिनकी वजह से मची तबाही।
  • ICIMOD, ISRO, IPCC ने बढ़ते जोखिम की दी चेतावनी।

हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों और भूस्खलन से जुड़ी आपदाएँ, जैसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) और लैंडस्लाइड लेक आउटबर्स्ट फ्लड (LLOF), बार-बार सुर्खियों में रहती हैं। ये आपदाएँ न केवल जान-माल को नुकसान पहुँचाती हैं, बल्कि हिमालयी क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी को भी प्रभावित करती हैं। आइए, समझते हैं कि GLOF और LLOF क्या हैं, इनके बीच अंतर, भारत में इनकी प्रमुख घटनाएँ, और भविष्य के लिए समाधान।

GLOF और LLOF: क्या हैं ये?GLOF (Glacial Lake Outburst Flood): जब ग्लेशियरों से बनी झीलों का प्राकृतिक बांध (मिट्टी, बर्फ, या चट्टान) टूटता है, तो अचानक पानी का सैलाब नीचे की ओर बहता है, जिससे भयंकर बाढ़ आती है। यह ग्लेशियरों के पिघलने से बनने वाली झीलों के कारण होता है। भारी बारिश, भूकंप, या मोरैन की कमजोरी इस बांध को तोड़ सकती है। GLOF का प्रभाव व्यापक होता है, जो नदियों, सड़कों, और बस्तियों को नष्ट कर सकता है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) के अनुसार, GLOF में प्रति सेकंड 10-100 क्यूबिक मीटर पानी बह सकता है

।LLOF (Landslide Lake Outburst Flood): यह तब होता है जब भूस्खलन से नदी या घाटी में अस्थायी झील बनती है, और उसका बांध टूटने से पानी तेजी से बह निकलता है। भारी बारिश या भूकंप के कारण पहाड़ों का फिसलना नदी को रोकता है, जिससे पानी जमा होता है। बांध के कमजोर होने पर यह बाढ़ स्थानीय स्तर पर मलबे के साथ तबाही मचाती है। ICIMOD के मुताबिक, LLOF में प्रति सेकंड 1-10 क्यूबिक मीटर पानी बहता है।भारत में GLOF और LLOF की प्रमुख घटनाएँहिमालयी क्षेत्र भारत के लिए अत्यंत संवेदनशील है, जहाँ GLOF और LLOF ने कई बार भारी तबाही मचाई है। यहाँ कुछ प्रमुख घटनाएँ हैं:

GLOF की

घटनाएँ
 

 क्या हुआ  आपदा का कारण  तथ्य
केदारनाथ आपदा 

चोराबारी ग्लेशियर की झील टूटने से 5,700 से अधिक लोग मारे गए, 1,000 वर्ग किमी क्षेत्र तबाह हुआ।

350 मिमी भारी बारिश और ग्लेशियर पिघलने से बांध कमजोर हुआ। इसरो के अनुसार, 20-22 किमी क्षेत्र में मलबा फैला।
उत्तराखंड, कुमाऊं    ग्लेशियल झील फटने से अलकनंदा नदी में बाढ़, कई गाँव प्रभावित। बर्फ पिघलना और भूकंप।  10-15 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड पानी बहा।
उत्तराखंड, ऋषिगंगा घाटी   ग्लेशियर टूटने से 200 लोग मरे, तपोवन बांध नष्ट।  ग्लेशियल झील का टूटना, संभवतः भूकंप और बारिश।   15 मिलियन क्यूबिक मीटर मलबा, 20 मीटर प्रति सेकंड गति।

LLOF की

घटनाएँ:
 

क्या हुआ आपदा का कारण  तथ्य
उत्तरकाशी भूस्खलन भूस्खलन से यमुना नदी अवरुद्ध, बांध टूटने से बाढ़।   6.6 तीव्रता का भूकंप और भारी बारिश।   1-2 किमी क्षेत्र प्रभावित, 768 लोग मरे।
हिमाचल प्रदेश, किन्नौर सतलुज नदी पर भूस्खलन से अस्थायी झील बनी, फिर बाढ़।   150 मिमी मॉनसून बारिश और ढीली मिट्टी।  5-10 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड पानी, 25 लोग प्रभावित।
हिमाचल प्रदेश, मंडी   भूस्खलन से नाला रुकने और टूटने से 500 हेक्टेयर जमीन बर्बाद।  100 मिमी प्रति घंटा की क्लाउडबर्स्ट।  10-15 घर नष्ट।

 

वैज्ञानिक शोध और विशेषज्ञों की रायवैज्ञानिकों ने हिमालयी आपदाओं के बढ़ते खतरे पर चेतावनी दी है। प्रमुख निष्कर्ष इस प्रकार हैं:  ICIMOD (2023): हिंदूकुश-हिमालय में 2,000+ ग्लेशियल झीलें, जिनमें 200 उच्च जोखिम वाली हैं। GLOF का खतरा सालाना 10-15% बढ़ रहा है।  

  • ISRO लैंडस्लाइड एटलस (2023): भारत के 147 जिले भूस्खलन से प्रभावित, जहाँ LLOF की संभावना बढ़ रही है।  
  • IPCC (2021): जलवायु परिवर्तन से ग्लेशियर सालाना 0.5-1% सिकुड़ रहे हैं, जिससे GLOF का खतरा बढ़ा।  
  • वाडिया इंस्टीट्यूट: हिमालय की 70% ढलानें भूकंपीय और जलवायु जोखिमों से संवेदनशील।

भविष्य का खतरा और समाधानविशेषज्ञों का अनुमान है कि 2050 तक 30-40% ग्लेशियर पिघलने से GLOF और LLOF की घटनाएँ दोगुनी हो सकती हैं। हिमालय का 1-1.2 लाख वर्ग किमी क्षेत्र जोखिम में है। इससे निपटने के लिए निम्नलिखित उपाय सुझाए गए हैं:  निगरानी: सैटेलाइट और सेंसर से ग्लेशियल झीलों की निगरानी।  

  • निर्माण नियंत्रण: भूस्खलन संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण पर रोक।  
  • पर्यावरण संरक्षण: जंगल संरक्षण और जल निकासी सुधार।  
  • प्रशिक्षण: स्थानीय लोगों को आपदा प्रबंधन की ट्रेनिंग।

हिमालयी क्षेत्र में GLOF और LLOF जैसी आपदाएँ भारत के लिए एक गंभीर चुनौती हैं। केदारनाथ (2013) और चमोली (2021) जैसी घटनाएँ हमें सतर्क रहने की चेतावनी देती हैं। जलवायु परिवर्तन और भूकंपीय गतिविधियों के कारण ये खतरे बढ़ रहे हैं। सरकार, वैज्ञानिक समुदाय, और स्थानीय लोगों को मिलकर निगरानी, संरक्षण, और जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है ताकि भविष्य में ऐसी तबाही को कम किया जा सके। 

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