आज भारत में शिक्षक दिवस मनाया जा रहा है। सभी जानते है कि यह भारत के पहले उपराष्ट्रपति, दूसरे राष्ट्रपति और महान शिक्षाविद् डॉ. एस. राधाकृष्णन की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है। यह दिन सिर्फ शिक्षकों के प्रति आभार व्यक्त करने का नहीं, बल्कि उनके उस अमूल्य योगदान को स्मरण करने का है जो हमारे व्यक्तित्व को गढ़ता और हमारे पूरे जीवन को एक सही दिशा देता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने X पर लिखा कि शिक्षक दिवस हमारे समाज में शिक्षकों के महत्वपूर्ण योगदान की सराहना करने का दिन है। यह डॉ. एस. राधाकृष्णन के प्रति सम्मान प्रकट करने का दिन भी है।
शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या पर, 'नेशनल टीचर्स अवॉर्ड' (राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार) पाने वालों को प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास, 7 लोक कल्याण मार्ग पर आमंत्रित किया गया था। इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी, केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रल्हाद जोशी, शिक्षा राज्य मंत्री डॉ. सुकांत मजूमदार और कौशल विकास एवं उद्यमिता राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) जयंत चौधरी शामिल हुए। इस कार्यक्रम का एक वीडियो प्रधानमंत्री मोदी के यूट्यूब चैनल पर भी अपलोड किया गया है। प्रधानमंत्री ने कार्यक्रम में मौजूद लोगों से बातचीत की।
कार्यक्रम में मौजूद एक शिक्षिका से बातचीत के दौरान, प्रधानमंत्री मोदी ने उनसे अपनी पब्लिक स्पीकिंग स्किल्स को बेहतर बनाने का सुझाव मांगा। उन्होंने पूछा कि अगर मैं आपका छात्र होता और एक अच्छा वक्ता बनना चाहता, तो आप मुझे क्या सलाह देतीं? मुझे क्या करना चाहिए? इस पर शिक्षिका ने जवाब दिया कि सबसे पहले, आपमें आत्मविश्वास होना चाहिए, जो लगातार अभ्यास से आता है। वैसे आपका प्रभाव (Aura) ऐसा है कि आपको देखकर शुरुआत में मैं खुद भी थोड़ी घबरा गई थी।
इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी ने बच्चों के बढ़ते स्क्रीन टाइम का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि स्क्रीन टाइम अब एक तरह का एडिक्शन बन गया है। मेरे मन में एक विचार आता है। अगर कोई बच्चा खेलों में गहरी दिलचस्पी लेने लगे और खेलों से मेरा मतलब वीडियो गेम नहीं, बल्कि मैदान पर असल में खेलना है, तो हो सकता है कि वह धीरे-धीरे इस लत से बाहर निकल आए। प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि कुछ बड़े शहरों या यूनिवर्सिटीज में सामने आने वाली ड्रग्स की समस्या के पीछे अक्सर जागरूकता की कमी होती है।
कभी-कभी बच्चों पर बिना समझाए ही नियम थोप दिए जाते हैं। आज के दौर में शिक्षकों को इसके गंभीर नतीजों के प्रति लगातार सतर्क रहने की जरूरत है। उन्हें यह देखना चाहिए कि क्या उनके प्रयासों से बच्चों के व्यवहार में कोई सकारात्मक बदलाव आ रहा है। उन्होंने शिक्षा जगत का आह्वान करते हुए कहा कि हमें किताबों और सिलेबस के दायरे से बाहर निकलकर बच्चों की जिंदगी का हिस्सा बनना पड़ेगा। एक शिक्षक का असली काम यह सुनिश्चित करना है कि बच्चों का बचपन मरना नहीं चाहिए।