देश में आवारा कुत्तों के बढ़ते हमलों और सड़कों पर बढ़ते हादसों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। आज जस्टिस संदीप मेहता, विक्रम नाथ और एन.वी. अंजारिया की बेंच ने इस मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि किसी जानवर का दिमाग पढ़ना मुमकिन नहीं है कि वह कब शांत है और कब काटने के मूड में है। सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने यह दलील दी कि अगर कुत्तों से सहानुभूति रखी जाए तो वे हमला नहीं करते, तो इस पर जस्टिस विक्रम नाथ ने सवाल किया, “आप यह कैसे पहचानेंगे कि किस वक्त कोई कुत्ता किस मूड में है? यह केवल काटने की बात नहीं है, बल्कि इनके कारण होने वाली दुर्घटनाओं पर भी सवाल है।”
कोर्ट ने चुटकी लेते हुए कहा, “बस एक चीज़ की कमी है कि कुत्तों की काउंसलिंग नहीं हो पा रही है कि उन्हें नसबंदी के बाद उसी इलाके में छोड़ा गया है, तो वे दोबारा न काटें।” कोर्ट ने साफ किया कि अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों और रेलवे स्टेशनों जैसे स्थानों पर आवारा कुत्तों का होना लोगों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है। बेंच ने सवाल उठाया कि कोर्ट परिसरों और स्कूलों के अंदर कुत्तों की क्या ज़रूरत है। इन जगहों को पूरी तरह कुत्तों से मुक्त किया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान जजों ने आवारा जानवरों के कारण होने वाले सड़क हादसों पर भी चिंता जताई। बेंच ने कहा कि पिछले 20 दिनों में ही दो जज आवारा जानवरों के कारण हुए हादसों का शिकार हो चुके हैं। कोर्ट ने कहा कि सड़कों से कुत्तों और मवेशियों को हटाना चाहिए, ताकि लोग सुरक्षित रह सकें। कोर्ट ने यह भी कहा कि इलाज से बेहतर बचाव है, इसलिए आवारा कुत्तों को आबादी वाले संवेदनशील इलाकों से दूर रखा जाए। साथ ही स्थानीय निकायों को निर्देश दिए गए हैं कि आवारा कुत्तों को शेल्टर होम भेजा जाए और उनका टीकाकरण, नसबंदी आदि सुनिश्चित किया जाए।