राष्ट्रीय राजनीति से एक बड़ी खबर सामने आई है। 'वन नेशन, वन इलेक्शन' का मुद्दा फिर से चर्चा का विषय बन गया है। इस विषय पर विचार-विमर्श करने के लिए हरिद्वार के अवधूत मंडल आश्रम में संतों का एक समागम, जिसमें केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान एवं उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस विचार का समर्थन किया। अगर इसे लागू किया जाता है, तो पूरे देश में लोकसभा चुनाव और राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों (UTs) के विधानसभा चुनाव एक साथ होंगे। ऐसी खबरें भी सामने आ रहीं हैं कि इसे 2034 के बजाय 2029 में लागू किया जा सकता है, हालांकि अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
पाली से लोकसभा सांसद पीपी चौधरी ने आज 'एक देश, एक चुनाव' पर बनी संयुक्त समिति की बैठक की अध्यक्षता की। बैठक के एजेंडे में कांग्रेस सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम, दिल्ली के पद्म पुरस्कार विजेताओं, 'नेशन फर्स्ट' और 'पॉलिसी रिसर्च सेंटर' के प्रतिनिधियों के साथ-साथ 'विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी' के प्रतिनिधियों के साथ चर्चा शामिल थी। बैठक के बाद मीडिया से बात करते हुए चौधरी ने कहा कि समिति को पद्म पुरस्कार विजेताओं से बहुमूल्य जानकारी मिली।
उन्होंने नागरिक समाज के प्रतिनिधियों के तौर पर अपने व्यापक अनुभव साझा किए और समिति को महत्वपूर्ण सुझाव दिए। चूंकि ये पुरस्कार विजेता अलग-अलग क्षेत्रों से आते हैं, इसलिए उन्होंने कई तरह के अनुभव साझा किए। मेरा मानना है कि समिति को उनसे अच्छी जानकारी और सुझाव मिले। वन नेशन, वन इलेक्शन पर उनकी राय बहुत महत्वपूर्ण है। आम तौर पर, पद्म पुरस्कार विजेताओं का मानना है कि वन नेशन वन इलेक्शन राष्ट्रीय हित में है, बशर्ते इसके लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय किए जाएं और समिति इस लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में काम करे।
यदि वास्तव में 2029 में वन नेशन, वन इलेक्शन लागू हो जाता है, तो अरूणाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, जम्मू-कश्मीर, आंध्र प्रदेश, सिक्किम, झारखंड और हरियाणा जैसे राज्यों या UT को कोई परेशानी नहीं होगी, क्योंकि वहां 2029 में ही लोकसभा और विधानसभा चुनाव होने हैं। इसके उलट, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड, मिजोरम, राजस्थान और तेलंगाना जैसे राज्यों में अगले चुनाव 2028 में होने हैं। ऐसे में, आम तौर पर उनका कार्यकाल 2033 तक चलता। लेकिन अगर 2029 में चुनाव कराए जाते हैं, तो अगली विधानसभा का कार्यकाल सिर्फ कुछ महीनों का ही होगा।
वहीं, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर, गोवा और गुजरात जैसे राज्यों में 2027 में चुनाव होने हैं। अगर 2029 वाली योजना लागू होती है, तो वहाँ चुनाव तय समय से तीन साल पहले कराने होंगे। बिहार और दिल्ली में भी चुनाव तय समय से एक साल पहले कराने होंगे। वहां विधानसभा चुनाव 2025 में हुए थे और उनका कार्यकाल 2030 तक चलना था। अगर 2029 में चुनाव होते हैं, तो वे एक साल पहले होंगे। इसी तरह, जिन राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों में 2026 में चुनाव हुए थे, जैसे असम, तमिलनाडु, केरलम, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल, तो यहां भी चुनाव दो साल पहले कराने होंगे। सामान्य हालात में, उनका कार्यकाल 2031 तक चलता। रिपोर्ट्स की मानें तो, इससे बार-बार होने वाले चुनावों से राहत मिलेगी, चुनाव का खर्च कम होगा और विकास की रफ्तार बढ़ सकती है।