भारतीय संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से 13 अगस्त तक चलेगा। सबकी नजरें इस सत्र पर टिकी हैं। इस सत्र के दौरान परिसीमन बिल समेत कई अहम बिल फिर से पेश किए जा सकते हैं। इससे पहले अप्रैल में केंद्र सरकार को झटका लगा था, जब जरूरी बहुमत न मिल पाने के कारण संविधान (131वां संशोधन) बिल और परिसीमन बिल रद्द हो गए थे।
लेकिन, अप्रैल से जुलाई के दौरान भारतीय राजनीति का परिदृश्य भी बदला है। चुनावों के बाद कई राज्यों में राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं। लोकसभा हो या राज्यसभा, भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाले नेशनल डेमोक्रेटिक अलायन्स (NDA) की स्थिति पहले के मुकाबले बेहतर हुई है।
विपक्षी दलों को सबसे बड़ा झटका पश्चिम बंगाल से ही लगा है। 2026 के विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की करारी हार के बाद, विधानसभा में इस दल के दो अलग-अलग गुट बन गए हैं। एक का नेतृत्व पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कर रही हैं, तो दूसरे गुट का नेतृत्व विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी कर रहे हैं।
इतना ही नहीं, लोकसभा में भी उनके 28 में से 20 सांसदों ने ममता का साथ छोड़ दिया और डॉ. काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय कर लिया। ये पार्टी NDA में शामिल हो चुकी है और इस गठबंधन में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है। तेलुगु देशम पार्टी (TDP) और जनता दल-यूनाइटेड (JD-U) के पास भी क्रमशः 16 और 12 लोकसभा सीटें हैं।
TMC के तीन राज्यसभा सांसद, सुखेंदु शेखर रॉय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाईक भी TMC छोड़कर BJP में शामिल हो गए हैं और पार्टी ने उन्हें उपचुनावों में उम्मीदवार बनाया है। इस बात की पूरी संभावना है कि वे ये उपचुनाव जीत भी जाएंगे। आज ही, TMC की एक और राज्यसभा सदस्य, कोयल मल्लिक ने भी उच्च सदन से इस्तीफा दे दिया है।
पश्चिम बंगाल के बाद, महाराष्ट्र से भी NDA के लिए अच्छी खबर आई, जब पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली शिवसेना-उद्धव बाळासाहेब ठाकरे (SS-UBT) के 6 सांसदों ने पाला बदलकर उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना (SS) का दामन थाम लिया। इससे न सिर्फ NDA को फायदा हुआ, बल्कि SS लोकसभा में 13 सांसदों वाली पार्टी बन गई और SS(UBT) के सांसदों की संख्या 9 से घटकर 3 रह गई।
तमिलनाडु में कांग्रेस और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के बीच लंबे समय से चला आ रहा गठबंधन टूट गया है। मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कड़गम (TVK) के साथ गठबंधन करने के फैसले के बाद दोनों पार्टियों के रिश्तों में खटास आ गई है। DMK आधिकारिक तौर पर NDA में शामिल नहीं हुई है, लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक, BJP को कुछ खास कानूनों के लिए DMK से मुद्दों के आधार पर समर्थन मिलने की उम्मीद है।
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी-शरदचंद्र पवार (NCP-SP) की लोकसभा सांसद सुप्रिया सुळे ने भी कल एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि अगर सरकार सभी राज्यों में सीटों में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी करती है और तो हम परिसीमन बिल का समर्थन करेंगे।
अभी लोकसभा में NDA के पास 318 और राज्यसभा में 152 सांसद हैं। अगर उसे DMK के 22 सांसदों और NCP(SP) के 8 सांसदों का समर्थन मिलता है, तो ये संख्या 348 तक पहुंच जाएगी। आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाई. एस. जगनमोहन रेड्डी की वाई. एस. आर. कांग्रेस पार्टी (YSRCP) ने अप्रैल में भी इस बिल का समर्थन किया था। अगर इस बार भी वो इस बिल का समर्थन करते हैं, तो उनके 4 लोकसभा सांसदों की मदद से ये संख्या 352 तक पहुंच जाएगी, जो जरूरी 360 के आंकड़े से कुछ कम है।
इस परिस्थिति में BJP को SS-UBT, शिरोमणि अकाली दल (SAD) और झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) जैसे दलों के समर्थन की जरूरत पड़ेगी। अगर BJP इस बार सफल होना चाहती है, तो उसे एक मिली-जुली रणनीति पर निर्भर रहना होगा, जिसमें क्षेत्रीय पार्टियों का समर्थन, वोटिंग से एब्सटेंशन और विपक्ष की कम उपस्थिति शामिल हो।