भारत की राजधानी नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 का आधिकारिक आगाज हो चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आधिकारिक तौर पर इस सम्मेलन के शुरू होने की घोषणा की। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरानी राष्ट्रपति डॉ. मसूद पेजेशकियान सहित कई गणमान्य नेता भारत मंडपम में एकत्र हुए हैं। ब्रिक्स नेताओं का स्वागत करते हुए, प्रधानमंत्री मोदी ने तमिलनाडु के रामेश्वरम में स्थित प्रसिद्ध श्री रामनाथस्वामी मंदिर की पृष्ठभूमि में उनका अभिवादन किया।
इस सम्मेलन में नेताओं को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि आप सभी का भारत में स्वागत करते हुए मुझे बहुत खुशी हो रही है। भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता पीपल सेंट्रिक और ह्यूमैनिटी फर्स्ट एप्रोच पर आधारित है। रेजिलिएंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन और सस्टेनेबिलिटी हमारी प्राथमिकताएँ रही हैं। इन प्राथमिकताओं के साथ-साथ, हमने ब्रिक्स के सहयोग को आम लोगों से जोड़ने पर भी खास बल दिया है। इसी सोच के साथ, 350 से ज्यादा बैठकें आयोजित की गईं। हमें लगभग 30 शहरों में आपकी टीमों का स्वागत करने का मौका मिला।
भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता को सफल बनाने में आप सभी के सक्रिय योगदान और सहयोग के लिए मैं आपका आभार व्यक्त करता हूँ। इस साल का ब्रिक्स शिखर सम्मेलन एक ऐतिहासिक पड़ाव है। हम BRICS की 20वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। इंसानी जिंदगी में, 20 साल की उम्र मेच्योरिटी और रिस्पॉन्सिबिलिटी के एक नए दौर की शुरुआत होती है।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि आज ब्रिक्स भी कमिंग ऑफ एज के क्षण में है। पिछले दो दशकों में, ब्रिक्स ने वैश्विक मंच पर अपनी एक वैश्विक पहचान बनाई है। हम एक-दूसरे के दृष्टिकोण का सम्मान करते हैं और कंसेंसस से आगे बढ़ते हैं। हम किसी का विरोध करके नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं। अब समय आ गया है कि हम ब्रिक्स के भीतर अपनी एकता और आम सहमति को वैश्विक मंच पर ठोस नतीजों में बदलें।
हमें अगले 20 सालों के लिए एक नए और एम्बिशियस एजेंडा पर काम करने की जरूरत है। हमें इस प्रक्रिया की शुरुआत अपने अंदरूनी वर्किंग सिस्टम से करनी चाहिए। भले ही ब्रिक्स की अध्यक्षता हर साल बदलती रहती है, लेकिन इससे हमारा इंस्टीट्यूशनल मोमेंटम नहीं रूकना चाहिए।
मेरा प्रस्ताव है कि ब्रिक्स में कन्टीन्युइटी और इम्प्लीमेंटेशन मैकेनिज्म बनाया जाए। इससे 'ट्रोइका' व्यवस्था के जरिए सभी इनिशिएटिव और आउटकम पर फॉलोअप हो सकेगा। हम हर फैसले से जुड़े नोडल पॉइंट, समय-सीमा और काम के स्टेटस का रिकॉर्ड रखने के लिए एक सुरक्षित डिजिटल रिपॉजिटरी भी बना सकते हैं।
ब्रिक्स को मजबूत करने के साथ-साथ, हमें ग्लोबल रिफॉर्म्स की दिशा भी तय करनी होगी। ग्लोबल गवर्नेंस का मौजूदा ढांचा एक पिरामिड जैसा है। पावर और डिसिशन मेकिंग की शक्ति सबसे ऊपर केंद्रित है, जबकि निचले स्तरों पर वे देश हैं जो इन फैसलों से प्रभावित तो होते हैं, लेकिन उन्हें आकार देने में उनकी कोई भूमिका नहीं होती।
आज, 'ग्लोबल साउथ' वैश्विक संकटों का सामना करने में फ्रंट रो में है, लेकिन डिसिशन मेकिंग में बैक रो में है। हमें पिरामिड ऑफ प्रिविलेज को प्लेटफॉर्म ऑफ पार्टनरशिप में बदलना होगा। एक ऐसा मंच जहाँ हर देश की आवाज सुनी जाए, हर सदस्य की भागीदारी हो और हर कोशिश के केंद्र में मानवता का विकास हो। इसके लिए, मेरा प्रस्ताव है कि हम ग्लोबल गवर्नेंस रिफॉर्म के लिए मिलकर 10 प्रोपोजल तैयार करें, ताकि अगले शिखर सम्मेलन तक उन्हें ब्रिक्स सुधार रोडमैप का रूप दिया जा सके।
प्रधानमंत्री मोदी ने आगे बताया कि इस रोडमैप को तैयार करते समय हमें तीन प्रमुख पहलुओं पर ध्यान देना होगा, रिप्रजेंटेशन, रिस्पॉन्सिवनेस और रूल-मेकिंग। रिप्रजेंटेशन के बारे में, मैं यह कहना चाहूंगा कि UN सिक्योरिटी काउंसिल में सुधार को अब और टाला नहीं जा सकता। इस मामले पर बातचीत को एक निश्चित समय-सीमा और स्पष्ट नतीजों से जोड़ा जाना चाहिए।
इसी तरह, फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस में वोटिंग पावर, लीडरशिप की भूमिकाएं और पॉलिसी की प्राथमिकताएं आज की इकोनॉमिक रियलिटी के अनुसार होनी चाहिए। जो देश ग्लोबल इकोनॉमिक ग्रोथ को आगे बढ़ाते हैं, उन्हें ग्लोबल इकोनॉमिक गवर्नेंस को आकार देने में भी उचित भूमिका निभानी चाहिए।
सीफेयरर्स वैश्विक व्यापार में बहुत बड़ा योगदान देते हैं, फिर भी मुश्किल समय में अक्सर उन्हें जरूरी मदद नहीं मिल पाती। मेरा प्रस्ताव है कि हम 'नाविकों के लिए आपातकालीन सहायता नेटवर्क' (Seafarers' Emergency Support Network) बनाएं। इससे संबंधित देशों के मेरीटाइम अथॉरिटीज और डिप्लोमेटिक मिशंस के बीच संपर्क बनेगा, जिससे डिस्ट्रेस अलर्ट, मेडिकल असिस्टेंस, परिवार को सूचना देने और इवेक्युएशन जैसे कामों में आसानी होगी।
प्रधानमंत्री ने कहा कि तीसरी बात जो मैं कहना चाहता हूँ, वह रूल-मेकिंग से जुड़ी है। भविष्य के ग्लोबल रूल्स तय करने में सबकी बराबर भागीदारी सुनिश्चित करना बहुत जरूरी है। AI, साइबरस्पेस, आउटर स्पेस, बायोटेक्नोलॉजी क्रिटिकल टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्र भविष्य के अवसरों के साथ भविष्य के नियम भी तय कर रहे हैं। हमें ग्लोबल साउथ को रूल-टेकर से रूल-शेपर के तौर पर बदलने की कोशिश करनी चाहिए। ब्रिक्स के जरिए, हम ग्लोबल साउथ के देशों के युवा डिप्लोमेट्स और पॉलिसी-मेकर्स को नेगोशिएशन स्किल्स, प्रैक्टिकल ट्रेनिंग और लीगल एक्सपर्टीज प्रदान कर सकते हैं।
उन्होने अंत में कहा कि यह एक सुखद संयोग है कि आज यूनाइटेड नेशंस डे फॉर साउथ-साउथ कोऑपरेशन है। ऐसे दिन ग्लोबल साउथ के लिए समर्पित इस तरह का निर्णय लेना विशेष महत्व रखता है। भारत इस प्रयास में नेतृत्व करने के लिए तैयार है। भारत की मेजबानी में हो रहे इस ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का संदेश स्पष्ट होना चाहिए। यदि हमारा भविष्य साझा है, तो उसे आकार देने का अधिकार भी साझा होना चाहिए। फ्रॉम वॉइस टू इम्पैक्ट, फ्रॉम प्रिविलेज टू पार्टनरशिप, यही ब्रिक्स@20 का संकल्प हो।