कार्तिक महीने का आरंभ त्योहारों और खुशियों से परिपूर्ण होता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, यह समय बड़े-बड़े व्रत और त्योहारों के साथ-साथ परिवारों में खुशियां और उमंग लेकर आता है। इन त्योहारों की श्रृंखला की शुरुआत एक ऐसे पर्व से होती है, जो हर दंपति के जीवन में बेहद खास माना जाता है।
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व करवा चौथ और कर्क चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है। भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं में करवा चौथ का विशेष स्थान है। यह पर्व केवल उपवास रखने और चंद्रमा के दर्शन करने तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रेम, विश्वास, समर्पण और दांपत्य जीवन की मंगलकामना का प्रतीक है। इस व्रत को सुहागिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए रखती हैं। सुहागिन महिलाओं के अलावा, विवाह योग्य लड़कियां भी इस व्रत को रखती हैं। यह व्रत निर्जला रखा जाता है और शाम के समय शुभ मुहूर्त में पूजा करने के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर खोला जाता है।
पौराणिक मान्यताओं में करवा चौथ का महत्व
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह व्रत पति-पत्नी के रिश्ते में प्रेम, निष्ठा और विश्वास को बढ़ाता है। इस व्रत की परंपरा देवताओं के समय से चली आ रही है। मान्यता है कि जब देवताओं और दानवों के बीच युद्ध शुरू हुआ और देवताओं की हार होने लगी, तब सभी देवता सहायता मांगने के लिए ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। इस संकट से बचने के लिए ब्रह्मा जी ने देवताओं की पत्नियों को व्रत रखने और सच्चे मन से अपने पतियों की दीर्घायु की कामना करने का सुझाव दिया। उन्होंने बताया कि ऐसा करने से युद्ध में देवताओं की विजय होगी।
देवताओं की विजय के बाद उनकी पत्नियों ने चंद्रमा के दर्शन कर अपना व्रत खोला। मान्यता के अनुसार, तभी से करवा चौथ की परंपरा की शुरुआत हुई। इसके अलावा, करवा चौथ के महत्व को वीरावती की पौराणिक कथा से भी जोड़कर देखा जाता है।
करवा चौथ 2026 : तिथि और पूजा की परंपरा
इस वर्ष करवा चौथ 29 अक्टूबर 2026, गुरुवार को मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 28 अक्टूबर 2026 की मध्य रात्रि करीब 1 बजकर 6 मिनट पर शुरू होगी, जबकि इसका समापन 29 अक्टूबर 2026 रात करीब 10 बजकर 9 मिनट पर होगा।
इस दिन महिलाएं प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश, माता पार्वती, भगवान शिव और चंद्रदेव की पूजा-अर्चना कर अपने परिवार की खुशहाली और पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं। व्रत की परंपरा के अनुसार महिलाएं प्रातःकाल सरगी ग्रहण करती हैं और व्रत का संकल्प लेती हैं। इसके बाद दिनभर उपवास रखने के बाद संध्या के समय पूजा की तैयारी करती हैं।
पूजा में करवा, दीपक, रोली, अक्षत, मिठाई और अन्य पूजन सामग्री का उपयोग किया जाता है। महिलाएं एकत्र होकर करवा चौथ की कथा सुनती है और पूजा-अर्चना करती हैं। इसके बाद चंद्रमा को अर्घ्य अर्पित कर अपने पति के हाथों जल ग्रहण करने के साथ व्रत का पारण करती हैं।
चंद्रमा को शीतलता, शांति और मन का कारक माना जाता है। इसलिए चंद्रदेव की पूजा को दांपत्य जीवन में प्रेम, संतुलन और सुख-समृद्धि की कामना से भी जोड़ा जाता है। यही वजह है की करवा चौथ का व्रत भारतीय संस्कृति में सुखी वैवाहिक जीवन, आपसी विश्वास और पति-पत्नी के अटूट रिश्ते का प्रतीक माना जाता है।