UCC बिल पारित करने वाला देश का तीसरा राज्य बना असम, विवाह और लिव-इन रिलेशनशिप्स का पंजीकरण अनिवार्य

सप्तपदी, आनंद कारज, होली यूनियन, वैदिक विवाह, ब्रह्म विवाह, अहोम चकलोंग विवाह, आशीर्वाद और निकाह को UCC के अंतर्गत विधिक अथवा कानूनी मान्यता भी प्रदान की गई है। रजिस्टर्ड लिव-इन रिलेशनशिप से जन्मे बच्चे को वैध संतान का दर्जा प्राप्त होगा। अब से ट्रिपल तलाक मान्य नहीं होगा और तलाक केवल कोर्ट के आदेश से ही प्रभावी होगा।

UCC बिल पारित करने वाला देश का तीसरा राज्य बना असम, विवाह और लिव-इन रिलेशनशिप्स का पंजीकरण अनिवार्य

इस बिल को पारित कर असम के मुख्यमंत्री ने एक बड़ा अहम चुनावी वादा पूरा कर दिया है।

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Highlights

  • पुरूषों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 21 वर्ष एवं महिलाओं के लिए 18 वर्ष निर्धारित कर दी गई है।
  • असम में एक माह के भीतर लिव-इन रिलेशनशिप्स का पंजीकरण कराना जरूरी है।
  • UCC में संविधान के अनुच्छेद 342 के अंतर्गत, असम के जनजातीय समुदाय को बाहर रखा गया है।

असम के लिए 27 मई का दिन बहुत विशेष रहा। प्रदेश की विधानसभा ने विपक्षी दलों के कड़े विरोध के बीच, यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) पारित कर दिया है। इसी के साथ असम, पूर्वोत्तर भारत का पहला एवं उत्तराखंड और गुजरात के बाद तीसरा राज्य बन गया, जहां ये बिल लागू हो चुका है।

विपक्षी दलों की मांग थी कि इस कानून को विस्तृत जांच के लिए सिलेक्ट कमेटी के पास भेजा जाए। असम के मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्वा सरमा ने सोशल मीडिया पर भी इस बिल के बारे में विस्तार से जानकारी दी। इस बिल के लागू होने के बाद, अब पुरूषों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिलाओं के लिए 18 वर्ष निर्धारित कर दी गई है।

विवाह और लिव-इन रिलेशनशिप्स का पंजीकरण अनिवार्य

असम में अब एक विवाह प्रथा अनिवार्य हो चुकी है। बिना किसी अपवाद, सभी विवाहों का पंजीकरण करवाना अनिवार्य होगा। सप्तपदी, आनंद कारज, होली यूनियन, वैदिक विवाह, ब्रह्म विवाह, अहोम चकलोंग विवाह, आशीर्वाद और निकाह को UCC के अंतर्गत विधिक अथवा कानूनी मान्यता भी प्रदान की गई है।

एक बहुत ही अहम फैसले में, अब असम में लिव-इन रिलेशनशिप्स का पंजीकरण कराना जरूरी है। एक माह के भीतर, पंजीकरण न होने पर तीन महीने की जेल, 10 हजार रूपए का जुर्माना अथवा दोनों का प्रावधान होगा। रजिस्टर्ड लिव-इन रिलेशनशिप से जन्मे बच्चे को वैध संतान का दर्जा प्राप्त होगा। पुरूष द्वारा संबंध छोड़ देने की स्थिति में, महिला भरण-पोषण के लिए कोर्ट में दावा कर सकेगी।

तलाक केवल कोर्ट के आदेश से होगा प्रभावी

आपसी सहमति से तलाक, अलग होने के 1 साल बाद ही लिया जा सकता है। असाधारण कठिनाई वाले मामलों में अदालत इस प्रक्रिया को तेज कर सकती है। अब से ट्रिपल तलाक मान्य नहीं होगा और तलाक केवल कोर्ट के आदेश से ही प्रभावी होगा।

व्यभिचार, क्रूरता, 2 साल से अधिक समय तक परित्याग, दूसरे धर्म में धर्मांतरण, मानसिक बीमारी और संहिता का उल्लंघन करते हुए पुनर्विवाह, इन आधारों पर तलाक की अनुमति होगी। पति या पत्नी में से कोई भी दूसरे से भरण-पोषण की मांग कर सकता है। लेकिन मेहर, डावर और स्त्रीधन जो पत्नी को मिला है, वह उसी का रहेगा और यह किसी भी भरण-पोषण के अतिरिक्त होगा।

जनजातीय समुदाय को UCC से रखा गया है बाहर

UCC में संविधान के अनुच्छेद 342 के अंतर्गत, असम के जनजातीय समुदाय को बाहर रखा गया है। मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्वा सरमा ने इस संबंध में X पर एक वीडियो साझा करते हुए लिखा, "​हमारे आदिवासी समुदायों ने लंबे समय से अपनी मजबूत पारंपरिक व्यवस्थाओं और सामूहिक सामाजिक जिम्मेदारी के जरिए महिलाओं की गरिमा की रक्षा की है और उसे बनाए रखा है। उनसे सीखने के लिए बहुत कुछ है।" इस बिल को पारित कर, असम के मुख्यमंत्री ने एक बड़ा अहम चुनावी वादा पूरा कर दिया है।

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