भारतीय राजनीति से एक बड़ी खबर सामने आई है। प्रमुख विपक्षी दलों में से एक, समाजवादी पार्टी (SP) ने उत्तर प्रदेश में होने वाले राज्यसभा चुनावों के लिए दो उम्मीदवार उतारे हैं। पार्टी ने राम गोपाल यादव और धनराज परिमल नाथवानी को प्रत्याशी बनाया है और दोनों ने आज अपने नामांकन पत्र दाखिल कर दिए हैं। दोनों ने SP के अध्यक्ष अखिलेश यादव की मौजूदगी में नामांकन किया। राम गोपाल यादव, अखिलेश यादव के चाचा हैं और उत्तर प्रदेश के जाने-माने यादव परिवार के सदस्य हैं। वहीं, धनराज गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन (GCA) के अध्यक्ष हैं और रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) में ग्रुप प्रेसिडेंट के तौर पर कंपनी के कॉर्पोरेट अफेयर्स, फाइनेंस, HR और CSR विभागों का कामकाज देखते हैं।
धनराज और उनके पिता परिमल धीरजलाल नाथवानी को अंबानी परिवार का नजदीकी भी माना जाता है। परिमल ने जून 2026 में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के समर्थन से झारखंड से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर राज्यसभा सीट जीती थी। राम गोपाल यादव 1992 से 2004 तक और फिर 2008 से आज तक उत्तर प्रदेश से लगातार राज्यसभा सांसद रहे हैं। उन्होंने 2004 से 2008 के बीच उत्तर प्रदेश की संभल लोकसभा सीट से भी सांसद की जिम्मेदारी निभाई है। इस घटनाक्रम पर BJP की ओर से प्रतिक्रिया भी सामने आई है।
BJP के राष्ट्रीय प्रवक्ता गौरव भाटिया ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट के जरिए SP पर निशाना साधा है। उन्होंने पार्टी के 'समाजवाद' और 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के नारे को ढोंग बताते हुए कहा कि राज्यसभा के लिए रामगोपाल यादव और एक बड़े पूंजीपति को उम्मीदवार बनाना पार्टी की वैचारिक कंगाली को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि SP में लोकतंत्र पर परिवारवाद हावी है और सत्ता की बागडोर अपने ही परिवार में सीमित रखने के लिए एक टिकट खानदान के नाम आरक्षित कर दिया गया है।
BJP प्रवक्ता ने आरोप लगाया कि जनहित पर क्रोनी कैपिटलिज्म भारी पड़ रहा है और दूसरा टिकट चांदी की थाली में सजाकर एक पूंजीपति को दे दिया गया है। उन्होंने सवाल उठाया कि अब SP का PDA और डॉ. राम मनोहर लोहिया का समाजवाद कहाँ चला गया? उन्होंने कहा कि चुनाव में वोट मांगते समय SP सामाजिक न्याय के बड़े-बड़े नारे लगाती है, लेकिन जब संसद भेजने की बारी आती है, तो पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर दिया जाता है।
गौरव भाटिया ने अंत में कहा कि SP के लिए PDA कभी कोई विचारधारा नहीं बल्कि सिर्फ एक चुनावी छलावा था। उन्होंने इसकी नई परिभाषा देते हुए 'P' से पूंजीपति, 'D' से डायनेस्टी (परिवारवाद) और 'A' से अन्याय बताया।